तमिलनाडु में SIR के बाद मतदाता सूची से महिलाओं के 2.6 लाख अधिक नाम क्यों हटे?

तमिलनाडु में हाल ही में हुए स्पेशल इंटेंसिव रिविज़न (SIR) के बाद मतदाता सूची से 97.3 लाख से अधिक नाम हटाए गए हैं, जिनमें महिलाओं की संख्या पुरुषों की तुलना में लगभग 2.6 लाख अधिक है। यह अंतर न सिर्फ़ प्रशासनिक प्रक्रिया पर सवाल उठाता है, बल्कि चुनावी प्रक्रिया में लैंगिक असंतुलन और लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व के लिए गंभीर चिंता भी पैदा करता है।

SIR क्या है और तमिलनाडु में क्या हुआ

  • SIR यानी स्पेशल इंटेंसिव रिविज़न निर्वाचन आयोग द्वारा समय–समय पर मतदाता सूचियों को अपडेट करने की विशेष प्रक्रिया है, जिसमें मृत, स्थानांतरित, डुप्लीकेट या अनुपस्थित मतदाताओं के नाम हटाए जाते हैं।

  • तमिलनाडु में हाल ही में किए गए SIR के बाद कुल मतदाता संख्या लगभग 6.41 करोड़ से घटकर लगभग 5.43 करोड़ रह गई, यानी करीब 97.3–97.4 लाख नाम हटाए गए।

  • नए मसौदा मतदाता सूची में लगभग 2.77 करोड़ महिलाएं और 2.66–2.67 करोड़ पुरुष दर्ज हैं, लेकिन हटाए गए नामों के विश्लेषण से पता चलता है कि महिलाओं की डिलीशन संख्या पुरुषों से लगभग 2.6 लाख अधिक है।

2.6 लाख अधिक महिलाएं क्यों हटाई गईं?

  • आधिकारिक तौर पर हटाए गए नामों के कारणों में मृत्यु, स्थायी रूप से स्थानांतरित या अनुपस्थित मतदाता, डुप्लीकेट एंट्री और स्वैच्छिक रूप से नाम हटवाने वाले शामिल हैं।

  • लेकिन जब डाटा को लैंगिक दृष्टि से देखा गया, तो पता चला कि SIR के दौरान महिलाओं के नाम हटाने की दर पुरुषों की तुलना में ज़्यादा रही, जिससे लगभग 2.6 लाख का अतिरिक्त अंतर बन गया।

  • ऐसी ही प्रवृत्ति पहले बिहार में भी दिखी थी, जहाँ SIR के बाद पुरुषों की तुलना में लगभग 6 लाख अधिक महिलाओं के नाम मतदाता सूची से हटे थे, जो इस बात की ओर इशारा करता है कि प्रक्रिया में संरचनात्मक या सामाजिक कारण महिलाओं के ख़िलाफ़ काम कर रहे हैं।

संभावित कारण: प्रक्रिया और समाज दोनों की भूमिका

  • ग्रामीण और गरीब समुदायों में महिलाओं की साक्षरता दर पुरुषों से कम होने के कारण स्वयं–पंजीकरण और स्वयं–सत्यापन (self-enumeration) की प्रक्रिया में महिलाएँ पीछे रह जाती हैं, जिससे उनके नाम ‘शिफ़्टेड’ या ‘अनट्रेस्ड’ मानकर हटाए जाने की संभावना बढ़ जाती है।

  • पुरुषों के रोज़गार के लिए बाहर जाने के बावजूद, वे अक्सर फॉर्म सही भरने या ऑनलाइन सत्यापन कराने में सक्षम होते हैं, जबकि घर पर मौजूद महिलाएँ प्रक्रिया की तकनीकी बारीकियों से कम परिचित होने के कारण अनजाने में बाहर हो सकती हैं।

  • घर–घर जाकर सत्यापन करने वाले बूथ लेवल अधिकारी कई बार अनुपस्थित पाए गए सदस्यों के पूरे परिवार की जानकारी सही से दर्ज नहीं कर पाते, और पारंपरिक लैंगिक पक्षपात के चलते महिलाएँ “अनुपस्थित” या “शिफ़्टेड” के रूप में अधिक दर्ज हो सकती हैं।

चुनावी प्रतिनिधित्व पर असर

  • जब मतदाता सूची से महिलाओं के नाम अपेक्षाकृत अधिक हटते हैं, तो यह महिला मतदाताओं की वास्तविक संख्या और उनकी चुनावी शक्ति दोनों को कम कर देता है, जिससे नीतियों और योजनाओं में महिला हितों का प्रतिनिधित्व कमजोर होता है।

  • तमिलनाडु जैसे राज्यों में, जहाँ पिछली कई चुनावों में महिलाओं की वोटिंग टर्नआउट पुरुषों से बराबर या कई बार अधिक रही है, इस तरह की डिलीशन उन्हें राजनीतिक रूप से “अदृश्य” बनाने का ख़तरा पैदा करती है।

  • यदि यह पैटर्न कई राज्यों में दोहराया गया, तो राष्ट्रीय स्तर पर भी महिला मतदाताओं की भागीदारी और प्रभाव पर नकारात्मक असर पड़ सकता है, जबकि संविधान और चुनाव आयोग दोनों ही समान और सर्वसमावेशी मतदान अधिकारों की गारंटी देने की बात करते हैं।

आगे का रास्ता: समाधान और सुधार

  • सबसे पहले ज़रूरी है कि तमिलनाडु में हटाए गए नामों का जेंडर–वाइज़, ज़िला–वाइज़ और समुदाय–वाइज़ विस्तृत डेटा सार्वजनिक किया जाए, ताकि नागरिक समाज, मीडिया और राजनीतिक दल स्वतंत्र रूप से इसका विश्लेषण कर सकें और किसी भी पैटर्न या संभावित भेदभाव को पहचान सकें।

  • जिन महिलाओं के नाम हटाए गए हैं, उन्हें दोबारा शामिल कराने के लिए मज़बूत क्लेम और ऑब्जेक्शन मैकेनिज़्म, विशेष कैंप, मोबाइल वेरिफिकेशन और स्थानीय भाषा में जागरूकता अभियान चलाए जाने चाहिए, साथ ही आखिरी तारीख़ तक लगातार सहायता केंद्र सक्रिय रहने चाहिए।

  • भविष्य में SIR जैसी प्रक्रियाओं के दौरान महिला स्वयं–सहायता समूहों, आशा वर्करों, आंगनवाड़ी कर्मियों और स्थानीय महिला संगठनों को सक्रिय रूप से शामिल करके सुनिश्चित किया जा सकता है कि हर पात्र महिला मतदाता का नाम सूची में दर्ज रहे और उसकी जानकारी ठीक से सत्यापित हो।

इस तरह, तमिलनाडु में SIR के दौरान पुरुषों की तुलना में 2.6 लाख अधिक महिलाओं के नाम हट जाना केवल एक तकनीकी या सांख्यिकीय घटना नहीं, बल्कि लोकतंत्र में लैंगिक समानता की बुनियाद को चुनौती देने वाला संकेत है। चुनावी तंत्र के लिए यह एक चेतावनी है कि यदि प्रशासनिक प्रक्रियाएँ सामाजिक वास्तविकताओं और लैंगिक विषमताओं को ध्यान में रखकर नहीं डिज़ाइन की जाएँगी, तो नागरिक अधिकार कागज़ पर तो बराबर दिखेंगे, लेकिन ज़मीनी स्तर पर उनका लाभ असमान रूप से बँटेगा।

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